Thursday, 3 May 2018

सुबह जल्दी उठने की फ़िक्र उसे रात को ठीक वक़्त पर बिस्तर पर लेटा तो देती है लेकिन
नींद अपनी मनमानी से बाज़ नहीं आती
दिन तो दुनियावी रश्मे बिताते बीत जाता है
लेकिन रातें उसकी दुश्मन है
अंधेरा होते ही पुराना वक़्त "भांये - भांये" उसके कानों में बजने लगता
वो करवटें बदलते शरीर को ऐसी स्थिति में ले जाने की कोशिश में था की उस नींद  जाए।

Waqt

ज़िंदगी के पल कुछ थाम ना सका कुछ रिश्तों को अपना बना ना सका पुराने दिन बहुत याद आते है कुछ किस्से बहुत रुलाते है जिगरी यार आईना...