Sunday, 4 February 2018

ये बरसात का मौसम, ये टपकती हुई छत 
ये नम आँखे और तेरे ख़त 

आज तो तू भीगने से डर रही है  मेरी जां 
कल ये  बारिशों  का मौसम  ही नहीं रह जायेगा 

भीगने दे इन पलकों को और भुझने दे दिल की तड़प 
कौन जाने फिर ये सावन लौट के कब आएगा 

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